परमहंसप्रिया

श्रीगणेशाय नमः ।
प्रकाशकीय

नमाम्यभोगिपरिवारसम्पदं निरस्तभूतिमनुमार्धविग्रहम् ।
अनुग्रमुन्मृदितकाललाञ्छनं विना विनायकमपूर्वशङ्करम् ॥
श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक ‘जन्माद्यस्य यतः’ - के ऊपर विद्वत्शिरोमणि मधुसूदनसरस्वती जी ने परमहंसप्रिया नामक व्याख्या लिखी है । यह व्याख्या अद्वैत वेदान्त के संन्यासी जिज्ञासुओं के लिये विचारणीय है । इस ग्रन्थ में महावाक्य का विचार हुआ है ।
पूर्व में यह व्याख्या दो बार प्रकाशित हुई है । प्रथम – चौखम्बा के द्वारा , तथा द्वितीय ललितालालितः के द्वारा । चौखम्बा से प्रकाशित संस्करण अपरिष्कृत था । द्वितीय संस्करण खण्डों में ललितालालितः के जालस्थल पर प्रकाशित हुआ था ।
उसी पर आधारित यह तीसरा संस्करण हमारे द्वारा प्रकाशित हो रहा है ।
प्रस्तुत संस्करण ललितालालितः के द्वारा मूलतः सम्पादित एवं संशोधित है ।
संन्यासी जिज्ञासुओं के अनायास बोध के लिये स्वामी नीलकण्ठानन्द गिरि जी के द्वारा पुनः सम्पादनपूर्वक विषयविभाग किया गया है तथा शीर्षक दिये गये हैं ।
इसलिये यह संस्करण साधकों के लिये एक सुन्दर अनुभव सिद्ध होगा । ऐसी मैं आशा करता हूँ ।

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 - ब्रह्मचारी ज्ञानचैतन्यः , 
www.lalitaalaalitah.com

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